संघ स्थापना की पृष्ठभूमि

संघ स्थापना की पृष्ठभूमि

हर्बर्ट स्पेंसर ने चार्ल्स डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का वर्णन करते हुए कहा- survival of the fittest. इसका आशय यह है कि जो जीव या प्रजाति अपने पर्यावरण के अनुसार सबसे बेहतर ढंग से खुद को ढाल लेते हैं, वही जीवित रहते हैं और आगे बढ़ते हैं, जबकि कमजोर या कम अनुकूल जीव नष्ट हो जाते हैं. 

कोई समाज तब तक ही बचा रहता है जब तक वह संघर्ष करने की क्षमता रखता है।  यदि वह कमजोर हो जाए तो विरोधी शक्तियां उसको निग़ल जाने का प्रयत्न करती हैं। 

अश्वं नैव गजं नैव सिहं नैव च नैव च।

 अजापुत्रं बलिं दद्यात् दैवो दुर्बल घातकः।।

घोड़े हाथी या सिंह की बलि नहीं दी जाती है बकरी के बच्चे की बलि दी जाती है क्योंकि कमजोर का भाग्य भी उसका साथ नहीं देता है। 

           डॉ० केशव बलिराम हेडगेवार अपने जीवन में देख चुके थे कि कम संख्या में रहने वाले एक पंथ विशेष के लोग जब चाहते हैं बहु संख्यको  को परेशान करते हैं, उनकी प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करते हैं, लूट मार करते हैं और आराम से लौट जाते हैं। ऐसे लोगों से बचने और इनको सबक सिखाने का एक ही उपाय है- हिंदू संगठित हों।

       डॉ0 हेडगेवार के व्यवहार में  बचपन से ही राष्ट्रीय भाव की झलक दिखती थी। 1897 में जब केशव केवल 8 वर्ष के थे तो इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया का 60 वर्ष पूरा होने पर  उनके विद्यालय में मिठाई  बांटी जा रही थी। बालक केशव को भी दोना में मिठाई मिली लेकिन वह खाया नहीं, घर के पास की नली में फेंक दिया। कोई और बच्चा होता तो जमकर खाता परंतु केशव के मन में एक विक्षोभ उत्पन्न हुआ कि रानी कहां की और मिठाई हमारे देश से बाँटी जा रही है। यह हमारे लिए लज्जा का विषय है। 1901 में 12 वर्ष की अवस्था में सप्तम एडवर्ड के राज्यारोहण के समय इंग्लैंड के औपनिवेशिक देशो में खुशियां मनाई जा रही थी। बालक केशव के विद्यालय में भी उत्सव मनाया जा रहा था । केशव के मन में बात आई कि यह हमारे लिए लज्जा का विषय है कि दूसरे देश के राजा के राज्यारोहण के समय में हमारे देश में हमें दासत्व का बोध कराने के लिए खुशियां मनाई जा रही हैं। केशव ने उस उत्सव में भाग नहीं लिया और उत्सव का बहिष्कार किया ।

       इसी प्रकार 1902 में राजा भोंसले के सीताबार्डी के किले पर फहरते हुए यूनियन जैक को देखकर घर के भीतर से सुरंग बनाकर यूनियन जैक को फेंक देना और भगवा झंडे को फहरा देने का भाव बालक केशव के मन में आया और उसने अपने मित्रों के साथ वझे गुरु जी के घर में मिट्टी खोद कर प्रयास भी किया । 19 वर्ष की अवस्था में 1908 में  रिस्ले सर्कुलर का विरोध करने के लिए विद्यालय में सरकारी मुसलमान निरीक्षक का ‘ वंदे मातरम’ से स्वागत हुआ जिसके मूल में केशव बलिराम हेडगेवार ही थे। हालांकि इस कार्य के चलते विद्यालय से उनका नाम कट गया और उनको अपने चाचा आबा जी के पास जाना पड़ा। इस प्रकार, हम देखते हैं की बचपन से ही डॉक्टर केशव बलिराम  हेडगेवार के मन में देशभक्ति का भाव भरा हुआ था।   इस क्रम में उनका अनेक देशभक्तों से संपर्क हुआ। उनके पीछे सरकार के गुप्तचर भी लगे रहते थे। पत्र पत्रिकाओं में बाल गंगाधर तिलक तथा सावरकर जी की बातें पढ़ा करते थे । उनकी बातें केशव बलिराम हेडगेवार जी को प्रभावित करती थी। नागपुर में रहते हुए ही नागपुर के क्रांतिकारी दल ने कोलकाता के बिहारी दास की देख-रेख में चलने वाली “अनुशीलन समिति” के साथ संबंध जोड़ लिया था ।अतः “अलीपुर बम केस ” के समय उसमें फंसे हुए देशभक्त तरूणों के बचाव के लिए नागपुर से भी धन संग्रह करके भेजा गया इसमें हेडगेवार जी ने भी निधि संग्रह किया था। जीवन में अनेक संघर्षों के बाद उनका डॉक्टर मुंजे के सहयोग से कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज में एडमिशन हुआ। यहां महाराष्ट्र लॉज में उनको किसी प्रकार से रहने की व्यवस्था हो सकी।  यहां रहते हुए अनुशीलन समिति के कार्यकर्ता के रूप में “कोकेन”नाम से अनेक क्रांतिकारियों के साथ जुड़े रहे। 12 सितम्बर 1914 को वे एल. एम. एंड एस. की पदवी लेकर डॉक्टर हो गए तथा 1 वर्ष का शिक्षणक्रम भी 1915 की जुलाई में पूरा हो गया। 1916 में वे कोलकाता से नागपुर आ गए। 

            डॉक्टर साहब जब नागपुर आए तो  उनके घर की स्थिति अच्छी नहीं थी फिर भी उन्होंने चिकित्सकीय वृत्ति को नहीं अपनाया । देश में घट रही घटनाओं से प्रभावित होकर अनेक क्रांतिकारियों से जुड़े रहे। वे डॉ0 मुंजे से पत्र लेकर पुणे गए और वहां लोकमान्य तिलक से भेंट की। डॉक्टर साहब कांग्रेस के द्वारा आयोजित अनेक कार्यक्रमों में भाग लिया करते थे। क्रांतिकारियों के लिए धन की व्यवस्था करना शस्त्र की व्यवस्था करना , ऐसे कामों में उनकी सहभागिता रहती थी।

खिलाफत आंदोलन – 

1917 में गांधी जी का भारतीय राजनीति में सक्रिय रूप में पदार्पण हो चुका था। उनका प्रभाव कांग्रेस में बढ़ता चला जा रहा था । 1918 में प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हुआ जिसमें धुरी राष्ट्र की पराजय हुई। इसमें जर्मनी के साथ तुर्की भी था।  वर्साय की संधि के द्वारा अंग्रेजों ने तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य को तहस-नहस कर दिया तथा तुर्की के खलीफा के अधिकार को सीमित कर दिया गया। मुसलमानों को लगा की अंग्रेजों ने हमारे साथ धोखेबाजी की है और उन्होंने यह मांग की कि खलीफा के ऊपर मित्र राष्ट्रों का अत्याचार समाप्त होना चाहिए। अन्यथा हम अंग्रेजों का असहयोग करेंगे। परंतु मित्र राष्ट्रों के सहयोग से इंग्लैंड ने खलीफा के पर कतर ने शुरू कर दिए।

       मुसलमान में अंग्रेजों के विरुद्ध असंतोष बढ़ने लगा। ठगा हुआ महसूस होने के कारण 1919 में  मोहम्मद अली तथा शौकत अली बंधुओ ने “खिलाफत आंदोलन” का बीजारोपण किया। मुसलमानो ने अंग्रेजों का विरोध शुरू कर दिया।

जलियांवाला बाग हत्याकांड 

18 मार्च 1919 को रोलेट एक्ट लागू किया गया इस एक्ट के मुताबिक किसी पर भी राजद्रोह का अभियोग लगाकर उसे जेल में बंद किया जा सकता था। इस नियम के विरोध में दिनांक 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पुण्य पर्व पर अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक बड़ी सभा हुई जिसमें लगभग दश हजार लोग एकत्र हुए। इस सभा में जनरल डायर ने अचानक गोली चलाने का आदेश दे दिया। इस घटना में हजारों स्त्री- पुरुष मारे गए तथा हजारों लोग घायल हुए। सरकार के इस हत्याकांड से संपूर्ण देश विक्षुब्ध हो उठा।

          उधर खिलाफत आंदोलन के कारण मुसलमान संतुष्ट थे और इधर इस दमनकारी निर्दयी घटना के कारण देशव्यापी क्रोधाग्नि भड़क उठी। इन दोनों घटनाओं को आधार बनाकर 24 नवंबर 1919 को अखिल भारतीय खिलाफ परिषद हुई जिसमें शौकत अली, मोहम्मद अली तथा गांधी जी सक्रिय रूप में काम कर रहे थे। गांधी को इसमें हिंदू – मुस्लिम एकता का आधार दिखाई पड़ रहा था । उन्होंने अध्यक्ष के रूप में कहा ,”हम लोग हिंदू- मुस्लिम- एकता का राग अलापते हैं परंतु मुसलमानों पर आपत्ति आने पर हम हिंदू यदि जी चुराने लगे तो एकता की घोषणाओं का क्या अर्थ है ? मुसलमानों की सच्ची सहायता निस्वार्थ होनी चाहिए”

        दिसंबर 1920 में नागपुर में अधिवेशन होने वाला था और इसमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक अध्यक्ष बने, इसके लिए नागपुर के अन्य नेताओं के साथ-साथ डॉक्टर साहब का  प्रयास चल रहा था। इसी बीच 31 जुलाई को लोकमान्य का निधन हो गया जिस डॉक्टर साहब का उत्साह कम हो गया परंतु अधिवेशन के लिए प्रयास उसी उत्साह से चलता रहा।

        असहयोग आंदोलन – 

गांधी जी ने 1 अगस्त 1920 को पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। डॉक्टर साहब ने नागपुर में असहयोग  आंदोलन का ताना-बाना बुनने में अहम भूमिका निभाई। उधर खिलाफत समिति ने हिंदुस्तान को दारुल हरब मानकर हिजरत कर दारुल इस्लाम में अर्थात् अफगानिस्तान आदि देशों में जाने की योजना बनाई। लगभग अठारह हज़ार मुसलमानों ने अफगानिस्तान जाने के लिए प्रस्थान किया। परंतु अफगानिस्तान की सीमा में प्रवेश करते ही वहां के कबीलों ने इन पर आक्रमण कर दिया । ‘ चौबे गए छब्बे बनने दुबे बनकर आए’ वाली कहावत चरितार्थ हो गई।यह मुसलमान सर पर पांव रखकर उल्टे पुनः भाग आए।

          26 दिसंबर को कांग्रेस का अधिवेशन शुरू हुआ और इसमें 14583 प्रतिनिधि, 3000 स्वागत समिति के सदस्य तथा लगभग 8000 दर्शक उपस्थित थे। इसमें डॉक्टर साहब का योगदान महनीय था। कांग्रेस अधिवेशन में अखिल भारतीय कार्य समिति की घटना ने डॉक्टर जी के विचारों को जोर का धक्का दिया। मुसलमानों को निकट लाने के लिए कांग्रेस ने खिलाफत का प्रश्न हाथ में ले लिया था परंतु उसी कांग्रेस से जब श्री बड़े ने यह प्रार्थना की कि गोरक्षण का प्रश्न राष्ट्रीय है तथा कांग्रेस को उस संबंध में भी कुछ करना चाहिए तो कहा गया कि इससे मुसलमान की भावनाएं आहत होंगी।अतः यह प्रश्न कांग्रेस हाथ में नहीं ले सकती। गांधी जी ने श्री बड़े को मंडल छोड़कर चले जाने को कहा। लेकिन श्री बड़े ने अपनी जगह नहीं छोड़ी। इस पर महात्मा गांधी ने अखिल भारतीय कार्यकारिणी की बैठक ही स्थगित कर दी। डॉक्टर साहब को इस घटना से बड़ी चोट पहुंची। वे कभी-कभी यह बात बता कर कहते थे कि “उस समय प्रत्येक प्रश्न की एक ही कसौटी थी कि मुसलमान प्रसन्न होकर हमारी और कैसे आएं।

        डॉक्टर जी को हिंदू मुस्लिम एकता का शब्द प्रयोग खटकता था इसके लिए एक बार उन्होंने महात्मा जी से भेंट कर उनसे प्रश्न किया कि वास्तव में तो हिंदुस्तान में हिंदू मुसलमान, ईसाई, पारसी,यहूदी आदि अनेक लोग रहते हैं। उन सब की एकता की कल्पना रखने के स्थान पर आप केवल यही क्यों बोलते हैं कि हिंदू- मुसलमान की एकता होनी चाहिए। इस पर गांधी जी ने उत्तर दिया – इसी कारण मैंने मुसलमानों के मन में देश के संबंध में आत्मीयता उत्पन्न की है जिससे आप प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि वह इस राष्ट्रीय आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं । गांधी के इस उत्तर से डॉक्टर साहब बहुत दुखी थे। उन्होंने कहा इस नए शब्द प्रयोग से तो मुझे आशंका है कि मुसलमानों में एकता के स्थान पर प्रतियोगिता की ही भावना बढ़ेगी । गांधी जी ने कहा “मुझे तो ऐसी कोई आशंका नहीं दिखती।” 

       असहयोग आंदोलन के मध्य में एक विचित्र साजिश रची गई थी । खिलाफत आंदोलन के सूत्रधार अंग्रेजों को भारत से निकाल कर अफगानिस्तान के अमीर को गद्दी पर बैठाने की योजना बना रहे थे और गांधी जी को इस योजना की जानकारी थी। स्वामी श्रद्धानंद जी के अनुसार “उनका इनको आशीर्वाद भी था।” संजोग से यह षड्यंत्र सफल नहीं हो गया। डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने कहा था “क्या कोई भी समझदार आदमी हिंदू- मुस्लिम एकता के लिए इतनी दूर तक जा सकता है?”

         डॉक्टर साहब ने यह भली-भांति समझ लिया था कि इस प्रकार के सभी प्रयत्नों के पीछे केवल व्यक्ति विशेष की लहर या इच्छा कारण न होकर आत्म विस्मृत हिंदू समाज की सामर्थ्य विहीन एवं दयनीय अवस्था ही है। 

मोपला विद्रोह –   

1921 में जब डॉक्टर साहब असहयोग आंदोलन के समय राजद्रोह के अभियोग में जेल में थे उसे समय मालाबार के तट समूह पर मोपालाओं ने सरकार तथा हिंदुओं के विरुद्ध सशस्त्र दंगा कर दिया था। इस घटना में “भारत सेवक समाज” ने जो वृत्त प्रकाशित किया उसके अनुसार- डेढ़ हजार हिन्दू मारे गए तथा 20,000 हिंदुओं का जबरदस्ती धर्म परिवर्तन किया गया। लगभग तीन करोड रुपए की धन संपत्ति की हानि हुई। परंतु कांग्रेस के नेताओं की किसी भी प्रकार मुसलमान को समेट कर ले चलने की नीति के कारण इन घटनाओं की भीषणता का पता जनता को नहीं लग पाया। इस हत्याकांड के बाद जब कांग्रेस ने उस पर दुख व्यक्त करने वाला प्रस्ताव स्वीकृत किया तो उसमें मुगलों के अत्याचारों के पहाड़ों को राई के समान तथा सरकारी दमन की राई को पहाड़ के समान बढ़ा- चढ़ा कर बताया गया। कांग्रेस के प्रस्ताव में कहा गया कि जिन हिंदू कुटुंबों का जबरदस्ती धर्म परिवर्तन किया गया वे माजरी के रहने वाले थे तथा जिन धर्मांध व्यक्तियों ने यह जघन्य कृत्य  किया उनका खिलाफत तथा असहयोग आंदोलन से विरोध था तथा अभी तक जो जानकारी मिली है उसके अनुसार केवल तीन परिवारों के ऊपर यह जबरदस्ती की गई दिखती है। आश्चर्य कहां बीस हजार और कहां तीन परिवार। मुगलों के इस विद्रोह को सरकार ने जब दबा दिया तो महात्मा गांधी तथा जवाहरलाल नेहरू अत्यंत व्यथित हुए। गांधी जी ने लिखा था – ईश्वर विश्वासी शूर  मोपले है जो कि जिसे वे धर्म समझते थे, उसके लिए उस मार्ग से जिससे वे धार्मिक मानते थे, लड़ रहे थे। नेहरू जी ने मोपलो के प्रति सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा “मोपालों का विद्रोह तथा उसका असाधारण रूप से दमन बंद रेलवे के डिब्बो में मोपलौं  का गर्मी के मारे तड़प तड़प कर मर जाना कितनी भयंकर एवं क्रूरता पूर्ण घटना थी।” ध्यान रहे कि गांधी जी ने माेपलों को ” ईश्वर विश्वासी शूर ” बताया। 

           डॉक्टर साहब इन सभी घटनाओं का बारीकी से निरीक्षण कर रहे थे। 05 फरवरी 1922 को उत्तर प्रदेश की चोरी चोरा गांव में क्रुद्ध ग्रामीणों ने थाना को आग के हवाले कर दिया जिसमें 22 सिपाही तथा एक अधिकारी जल गए। यह देखकर महात्मा गांधी ने आंदोलन को स्थगित कर दिया।

         1923 में तुर्की के नेता मुस्तफा कमाल पाशा ने खलीफा को हटाते हुए कहा “खलीफा ! तुम्हारी गाड़ी एक ऐतिहासिक अवशेष मात्र है । इसे बने रहने का कोई औचित्य नहीं।”खिलाफत आंदोलन जिस डाली के हिंडोला में झूल रहा था वह डाली ही टूट गई । परिणाम स्वरूप खिलाफत आंदोलन समाप्त हो गया परंतु भारत के मुस्लिम नेताओं ने “पैन इस्लामिजम ” का नया नारा देकर मुसलमानों में उपद्रवी भाव को बनाए रखा। 1923 के उपरांत के मुसलमानो द्वारा किए गए दंगे  इसी नीति के परिणाम थे।

      1923 की गर्मियों में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में जो विपक्ष दंगा हुआ इससे हिंदू मुसलमान एकता का छद्म रूप सामने चला आया। दंगे में हिंदुओं की दैन्य यातनाएं देखकर भाई परमानंद ने लाहौर में जाकर ‘ हिंदू संघ’ नाम से संस्था की स्थापना की। इसी समय नागपुर में भी घटना घटी। नागपुर में शुक्रवार तालाब के दक्षिण की ओर गणेश पेट है उसमें एक गणेश मंडल चलता था वहां दिइंडी (भजन मंडली ) ढोल बाजा बजाते हुए एक मस्जिद के सामने से गुजरती थी। इस वर्ष मस्जिद के सामने  मुसलमानों ने दींडी यात्रा रोक दी। कांग्रेस तथा खिलाफत समिति के बीच काफी दिन तक बातचीत चलती रहे परंतु कोई नतीजा नहीं निकला।

       एक दिन राजा लक्ष्मण राम भोसले ने मुसलमान नेताओं को बुलाकर पूछा कि आप दींडी जाने देंगे कि नहीं? स्पष्ट और निर्भीक प्रश्न सुनकर मुसलमान सकपका गए ।उन्होंने हां कह दिया । 23 अक्टूबर को आबाध रूप में वह दींडी यात्रा चली गई । दूसरे दिन फिर उन्होंने अड़चन डाली। इस समय डॉक्टर हेडगेवार, डॉक्टर चोलकर तथा श्री दाजी शास्त्री चंद्राकर ने भिन्न-भिन्न भागों में सभा करके तथा घर-घर में प्रचार करके बताया कि अधिक से अधिक लोगों को दींडी में भाग लेना चाहिए। दूसरे दिन डॉक्टर चोलकर, डॉक्टर परांजपे डॉक्टर हेडगेवार आदि 41 लोगों ने भाग लिया। उनको देखने के लिए रास्ते में हजारों की संख्या में लोग सड़क के दोनों किनारे खड़े हो गए। उस दिन सशस्त्र पुलिस ने उनको रोक लिया और थाने ले जाकर छोड़ दिया । दूसरे दिन दश हजार लोगों के बीच में भाषण देते हुए राजा लक्ष्मण राव भोसले ने “हिंदू सभा” की स्थापना की घोषणा की । उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म के अधिकारों का उपभोग हिंदुस्तान में सभी हिंदुओं को करना चाहिए । यदि इन अधिकारों का उपभोग हिंदू हिंदुस्तान में अपनी मातृ भूमि में नहीं कर सकता तो और कहां कर सकेगा। उन्होंने मंच से घोषणा की दींडी यात्रा में हम सबको भाग लेना चाहिए। दूसरे दिन हजारों की संख्या में हिंदू यात्रा में भाग लेने के लिए और इस मस्जिद के सामने अबाध गति से निकले।

              डॉक्टर साहब ने घूम-घूम कर हिंदुओं को एक रहने का मंत्र दिया । उनके मन में यह प्रश्न स्वाभाविक ही उठा कि आज न दिखने वाली एकता क्या इतिहास में कभी दिखी ?भूतकाल तो यही बताता है कि दाहिर के समय से हिंदू स्वराज के अंत तक कभी पृथ्वीराज ने तो कभी महाराणा प्रताप ने, कभी हक्क- बुक्क ने  तो कभी कृष्ण देव राय ने, कभी गुरु गोविंद ने तो कभी गुरु बंदा ने, कभी छत्रपति शिवाजी ने तो कभी शांता जी ने, कभी बाजीराव ने तो कभी महाद ने मुसलमानों के तत्कालीन आक्रमण को पराया मानकर उसे नष्ट करने का प्रयत्न किया है ।

    इसी समय में वीर सावरकर के द्वारा लिखी हुई हिंदुत्व नामक पुस्तक डॉक्टर साहब के हाथ में पड़ी ।उसको पढ़कर के डॉक्टर साहब ने अनुभव किया कि सोए हुए हिंदू समाज को जगाने के लिए तथा हिंदुत्व के सुप्त मानस को झकझोर कर उठाने का सामर्थ्य सावरकर जी के ग्रंथ “हिंदुत्व” में था।

       दींडी सत्याग्रह के समय मुसलमानों के दंगे का छोटा स्वरूप 1924 में दिखाई पड़ा ।  12, 13 जुलाई को ईद और आषाढ़ी एकादशी एक साथ आ गई । उस समय मुसलमानों की आक्रमणकारी प्रवृत्ति पुनः उठने लगी। किंतु इस  वर्ष हिंदू सजग थे। इस कारण उनकी दाल नहीं गली। 30- 35 मुसलमानों को अस्पताल जाना पड़ा।

        नागपुर के साथ-साथ देश के अन्य भागों में भी हिंदू मुस्लिम एकता के बुलबुले फूटते जा रहे थे । श्रीमती सरोजिनी नायडू ने महात्मा गांधी जी को लिखा- शांति के भाषण तथा प्रवचन  बहुत हो गए। डॉ आंबेडकर ने कहा – एकता परिषद में केवल लुभावने प्रस्ताव होते थे तथा उनकी घोषणा होते ही व्यवहार में उनका उल्लंघन किया जाता था। 

     स्वामी श्रद्धानंद जी ने मोपला विद्रोह के बाद एक बार कहा “मुसलमान जितने सुसंगठित हैं उतना हिंदू समाज नहीं है। हिंदू नेताओं को अपना समाज संगठित करना चाहिए।”1924 में हिंदू महासभा के बेलगांव अधिवेशन में पंडित मदन मोहन मालवीय ने कहा – हिंदुओं में भीरूता तथा दुर्बलता न होती तो हिंदू मुसलमान के बहुत से दंगे स्वतः ही टल गए होते । इन दंगों से राष्ट्र के लिए विधायक स्थिति उत्पन्न हो जाने के कारण उनके लिए बहुत कुछ अंशो में जिम्मेदार हिंदुओं की दुर्बलता को दूर करना आवश्यक है। इसी अधिवेशन से लौटते हुए पुणे की सार्वजनिक सभा में स्वामी श्रद्धानंद जी ने कहा – सिंहगढ़ सरीखे कठिन स्थान पर जिस महाराष्ट्र ने भगवा ध्वज लहराया वह महाराष्ट्र अत्यंत निर्भय था। आज हम अपना भगवा झंडा छोड़कर किसी भी झंडे के नीचे इकट्ठा होने लगे हैं, यह भूल दूर करके पुनः अपने सही स्वरूप को पहचानिए तथा सच्चे वैदिक धर्म तथा आर्य संस्कृति की रक्षा कीजिए।

  इन सभी घटनाओं ने डॉक्टर साहब के मन पर अविच्छिन्न प्रभाव डाला। कांग्रेस के अनेक कार्यकर्ताओं से संबंधित भानुमति के उसे कुनबे को छोड़ दिया तथा 1925 के प्रारंभ में उन्होंने हिंदू राष्ट्र के पुनरुद्धार के कार्य को प्रारंभ करने का मन ही मन निश्चय कर लिया । बाद में उन्होंने सावरकर जी से भेंट करने के निश्चय किया । विनायक दामोदर सावरकर उस समय रत्नागिरी में स्थानाबद्ध थे । डॉक्टर साहब वहां गए । उनके पास संगठन संबंधी अपनी कल्पना रखी और सावरकर जी का विचार भी जान लिया। उन्हें यह स्पष्ट हो गया था कि हिंदुस्तान को देश की संज्ञा देने के लिए जिस समाज ने भारतीय प्रयत्न किये उन हिंदुओं का ही यह देश है। इस समाज का ह्रास मुसलमान अथवा अंग्रेजों के कारण नहीं हुआ अपितु राष्ट्रीय भावना के शिथिल हो जाने पर व्यक्ति एवं समाज के सही संबंध बिगड़ गए तथा इस प्रकार असंगठित अवस्था के कारण ही एक समय दिग्विजय का डंका दशो दिशाओं में बजाने वाला हिंदू समाज सैकड़ो वर्षों से विदेशियों की पाशविक सत्ता के नीचे पद दलित है।

अपने समाज में मनुष्य- बल, धन-बल तथा शस्त्र-बल सब कुछ था परंतु मैं राष्ट्र का घटक हूं तथा उसके लिए मेरा जीवन लगना चाहिए, यह कर्तव्य की भावना व्यक्ति के हृदय से नष्ट होने के कारण सारी शक्ति होते हुए भी समाज पराभूत हो गया। इसके लिए समाज की नस-नस में राष्ट्रीयता की उत्कट भावना भरकर उसे भावना से संपूर्ण समाज अनुशासित एवं संजीवित कर उसे अधिक विजय राष्ट्र के रूप में खड़ा किया जाए, यह महान मंगल संकल्प डॉक्टर जी ने किया । इसी संकल्प का मू र्त रूप है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। उन्होंने विजयदशमी 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की और घोषणा की कि  भारत हिंदू राष्ट्र है, शक्ति द्वारा ही सभी कार्य संभव है, तथा संगठन में ही शक्ति है ।अतः संगठन व अनुशासन आवश्यक है।

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