★ गुरु शब्द का अर्थ –
गुरु शब्द में दो भाग है – “गु”और “रु” । “गु” अर्थत् अंधकार और “रु” अर्थात् प्रकाश । अंधकार से प्रकाश की ओर ले जानेवाला ही गुरु कहलाता है –
“गु शब्दः अन्धकारे स्यात् रु शब्दः तत् निरोधके ।
अन्धकार निरोधत्वात् गुरुरिति अभिधीयते ।।”
असत् से सत् की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने वाला गुरु कहलाता है―
असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्मा अमृतम् गमय ।
★ गुरु कौन :-
“को गुरुः ? अधिगततत्त्वः शिष्य हिताय उद्यतः सततम् ।”
प्रश्न है कि गुरु कौन होता है? इसका उत्तर है कि जो तत्वों को समझने वाला होता है तथा शिष्य के कल्याण के लिए लगातार तत्पर रहता है वह गुरु होता है ।
हमारे ऋषियों-महर्षियों ने कहा है कि गुरु हमारे अंतस्तल में अज्ञानता रूपी अंधेरे को समाप्त कर ज्ञान रूपी प्रकाश भरता है। अज्ञान रूपी अंधेरे से अंधे हो चुके हुए व्यक्ति की आंखों को ज्ञान रूपी अंजन की शलाका से जो खोल देता है ( वह गुरु होता है और ) उस गुरु को नमस्कार ―
अज्ञानतिमिरांधस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया ।
चक्षु: उन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
★ गुरु का महत्त्व :–
जीवन मे गुरु के बिना ज्ञान संभव नहीं है । रामचंद्र के जीवन में गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र का क्या महत्व है यह सबको पता है । अर्जुन के जीवन में गुरु द्रोणाचार्य का क्या महत्व है यह हम सब जानते हैं । चंद्रगुप्त को समृद्ध करने में चाणक्य का योगदान शिवाजी को हिंदुत्व के प्रति समर्पित करने में समर्थ रामदास का महत्व छिपा हुआ है। गुरु अपने शिष्य को समाज का दायित्त्वपूर्ण नागरिक बनाने के लिए वैसे ही प्रयत्न करता है जैसे सुघड़ घड़ा बनाने के लिए कुम्हार मिट्टी को तैयार करता है –
गुरु कुम्हार शिख कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़े खोट।
अंतर हाथ सहार दे , बाहर बाहर चोट ।।
गुरु उस कुम्हार के सदृश होता है जो मिट्टी रुपी शिष्य की कमियों को चुन चुन करके बाहर निकालता है , उसको सच्चरित्र, समझदार तथा संयमित नागरि}aक बनाने के लिए भीतर से हाथ का सहारा देता है तथा अनुशासित बनाने के लिए ऊपर से चोट देता है ।
ऋषि-मुनियो ने गुरु का स्थान ब्रह्मा-विष्णु-महेश से भी ऊपर परं ब्रह्म का स्थान दिया है ―
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।
कबीर दास कहते हैं कि वे व्यक्ति मूर्ख हैं जो गुरु के महत्व को नहीं समझते हैं । जीवन में गुरु का ऐसा महत्व है कि यदि ईश्वर भी हमसे रूठ जाएं तो कोई बात नहीं , गुरु की शरण हमें प्राप्त होती है। परंतु यदि गुरु रूठ जाएं तो दुनिया में कोई जगह नहीं–
कबिरा ते नर अंध है, गुरु को कहत है और।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ।।
वे कहते हैं कि यदि तीर्थाटन करने से एक फल की प्राप्ति होती है, सज्जन के मिलने से चौगुले फल की प्राप्ति होती है तो समझिए कि यदि जीवन में एक सद्गुरु प्राप्त हो जायें तो अनंत फल की प्राप्ति होती है –
तीरथ करे तो एक फल, सज्जन मिले फल चार ।
सद्गुरु मिले अनंत फल , कहे कबीर विचार ।।
कविवर कहते है शीश देकर भी यदि गुरु प्राप्त होते हैं तो सस्ता ही समझो –
यह तन विष की वल्लरी, गुरु अमृत की खान ।
शीश दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ।।
भगवान को जब पहचानने की बात आती है तो गुरु ही होते हैं जो भगवान के बारे में बताते हैं। अतः हम कह सकते हैं कि भगवान और गुरु में जब महत्ता की बात आएगी तो गुरु का महत्व ईश्वर से भी बड़ा है । कवि ने कहा है–
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताए ।।
गुरु की महत्ता का अनुभव किया जा सकता है कि रामचन्द्र प्रातःकाल माता-पिता और गुरु के चरणों की वंदना करते थे –
प्रात काल उठि के रघुनाथा, मात पिता गुरु नावहिं माथा।
★आषाढ़ की पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा क्यों?
― ऐसी मान्यता है कि ऋषियों में श्रेष्ठ ऋषि व्यास का जन्म इसी आषाढ़ की पूर्णिमा को हुआ था इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा को हम गुरु पूर्णिमा या व्यासपूर्णिमा भी कहते हैं ।
― आषाढ़ मास में चारों तरफ पानी ही पानी हो जाता है। नदियां उफान पर होती हैं और सामान्यतः लोगों का आना जाना अवरुद्ध हो जाता है । आज तो यत्र तत्र आने जाने के लिए आवागमन की सुविधा भी है परंतु प्राचीन काल में ऐसी व्यवस्था नहीं के बराबर थी। इसलिए शिष्य अपने आश्रम में आकर गुरु के सान्निध्य में रहते थे। बाकी समय में तो वे यत्र-तत्र भिक्षाटन करते गुरु से शिक्षा ग्रहण करते थे । बरसात के समय में उनका भिक्षाटन करना कठिन हो जाता था इसलिए वे गुरु के सन्निध्य में रहकर 4 माह तक अध्ययन करते थे और उसी समय गुरु पूजन का कार्यक्रम करते थे । इसलिए आषाढ़ का महीना जब चारों तरफ पानी ही पानी हो जाता था गुरु पूजन के लिए प्राचीन काल में सर्वथा उपयुक्त माना जाता था । आज की तरह उस समय आवागमन के साधन तो थे नहीं अतः आश्रम में ठहर जाना ही उपयुक्त माना जाता था ।
माननीय सुरेश सोनी जी अपनी पुस्तक “गुरुत्व याने हिंदुत्व” मैं कहते हैं कि जिस प्रकार से पृथ्वी का अस्तित्व तब तक ही बचा हुआ है जब तक उसमें गुरुत्व की शक्ति है उसी प्रकार से गुरु में उसका ज्ञान- गाम्भीर्य ही उसका गुरुत्व है और भारत के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो हिंदुत्व ही भारत का वास्तविक गुरुत्व है।
★ आखिर इस प्रकार का गुरु जो भगवान से भी श्रेष्ठ हो परमपिता परमेश्वर के तुल्य हो कहां पाया जा सकता है ? ऐसा गुरु कौन होगा जिसमें इतने अद्वितीय गुण पाए जाते हैं?
★ व्यक्ति पूजा नहीं तत्व पूजा – संघ का कार्य जब नागपुर से बाहर फैलने लगा तो ऐसा महसूस हुआ कि अब अर्थ के बिना यह कार्य तेजी से नहीं हो सकता है । फिर बात आई कि अर्थ की व्यवस्था कैसे हो ? हम किसी व्यक्ति से एक बार ,दो बार सहयोग राशि ले सकते हैं परंतु बार-बार तो नहीं ली जा सकती, तो उन्होंने गुरु पूजन कार्यक्रम की योजना बनाई । अब अहम प्रश्न यह उपस्थित हुआ कि गुरु किसको माना जाए? डॉक्टर साहब गुरु के प्रति अलग प्रकार का दृष्टिकोण रखते थे। हम किसी व्यक्ति को नहीं पूजेंगे। यदि हम किसी व्यक्ति को गुरु मान लेते हैं तो वह सर्वकालिक गुरु नहीं हो सकते क्योंकि व्यक्ति को गुरु मानने में एक कठिनाई है कि व्यक्ति होने के कारण उसमें कभी भी, कोई कमी आ सकती है। व्यक्ति स्खलनशील होता है । हम तत्व निष्ठा में विश्वास रखते हैं, व्यक्ति-निष्ठा में नहीं । संघ व्यक्तिनिष्ठ नहीं तत्वनिष्ठ है । कोई भी व्यक्ति सबके लिए आदर्श और पूजनीय नहीं बन सकता। कोई कितना भी अच्छा और सच्चरित्र व्यक्ति क्यों न हो वह किसी विशेष समुदाय के लिए तो गुरु हो सकता है परंतु सर्वमान्य गुरु संभव नहीं । डॉक्टर साहब ने व्यक्ति की पूजा नहीं करके तत्व निष्ठा की बात की ।
काफी विचार विमर्श करने के बाद उन्होंने हजारों वर्षों से पवित्रता, त्याग और तप का आदर्श भगवा ध्वज को गुरु मानने का निश्चय किया । एक व्यक्ति कुछ गलती कर सकता है लेकिन भगवा ध्वज क्या गलती करेगा ? यह शदियों से पूजा जाने वाला, ऋषि-महर्षियों के द्वारा धारण किया जाने वाला , पवित्रता का प्रतीक, अग्नि का प्रतीक, प्रातः उदीयमान होने वाले सूर्य का प्रतीक भगवा ध्वज ही अपना गुरु हो , ऐसा परम पूज्य डॉक्टर साहब ने निर्णय लिया । अपने इतिहास के जितने आदर्श राजा रहे – चाहे राणा प्रताप हों, शिवाजी हों सब ने इसी भगवा ध्वज को अपनी विजय की पताका माना तथा सम्मान दिया। राजा महाराजाओं के दुर्ग पर यही परम पवित्र ध्वज लहराता रहता था।
★ गुरु के प्रति समर्पण भाव –
गुरु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन एवं समर्पण का प्रतीक गुरु दक्षिणा हमारी प्राचीन पद्धति रही है । इसके अनेक उदाहरण परिलक्षित होते हैं। जैसे – ऋषि धौम्य-आरुणि, स्वामी रामदास-शिवाजी, रामकृष्ण परमहंस-स्वामी विवेकानंद, गुरु वरतन्तु- कौत्स ऋषि आदि । परमेश्वर की कृपा से मुझे जो कुछ भी प्राप्त हुआ है वह गुरु के चरणों में समर्पित होना चाहिए। प्रार्थना के प्रथम पद्य में “पतत्वेष कायो ” एक ऐसा ही समर्पण का भाव है ।
राजा शिवि ने एक अंधे ब्राह्मण के लिए अपनी आंखें दान कर दीं, महर्षि दधीचि ने धर्म युद्ध को जीतने के लिए और असुरों के बध के लिए अपनी हड्डी दान कर दी । अपनी संस्कृति में सत्कर्म के लिए त्याग की अनगिनत कहानियां छाई हुई हैं । कहा गया है कि धन तो तुच्छ और सारा हीन होता है यदि इसका लोक कल्याण हेतु सदुपयोग हो तो यह ध्यान महानता को प्राप्त होता है अन्यथा एक जगह पड़े पड़े मृत हो जाता है –
निस्सार लघोः धनस्य स सारः यत् दीयते लोकहितोन्मुखेन।
निधानतां हि याति दीयमानं अदीयमानं निधानैकनिष्ठम् ।।
★ राष्ट्र निर्माण हेतु जनशक्ति और धन शक्ति दोनों की अत्यंत ही महत्ता है । यदि हम राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाना चाहते है तो धन की आवश्यकता पड़ेगी । संघ वर्ष भर में केवल एक बार गुरु दक्षिणा के द्वारा जो अर्थ एकत्र करता है उसी से वर्षभर अपना काम चलता है । हमारे देश में अनेक ऐसी गैर सरकारी संस्थाएं हैं जिन्हें देश तोड़ने के लिए, देश को कमजोर करने के लिए , देश को अस्थिर करने के लिए , हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने के लिए दूसरे देशों से विरोधी शक्तियाँ अथाह पैसे भेजती हैं । तथाकथित सेक्युलर (पंथ निरपेक्ष ) पार्टियाँ भी हिंदुत्व को कमजोर करने पर तुली हुई हैं । ऐसे में हमने राष्ट्र को गौरवशाली बनाने का ध्येय अपनाया है, उसके निमित्त त्याग और समर्पण तो करना ही होगा । संघ एकमात्र ऐसा संगठन है जो स्व- वित्त-पोषित है । हम स्वयंसेवक इसका खर्च स्वयं वहन करते हैं । वर्ष में जो एक बार गुरु दक्षिणा का कार्यक्रम होता है उसी से संघ का काम चलता है । इसलिए हम सभी लोगों को संकल्प के साथ दक्षिणा अपने सामर्थ्य के अनुसार करना ही चाहिए । वह दक्षिणा समर्पण का एक भाग है, उसमें कोई घमंड और अहं की बात नहीं है । हम जब दक्षिणा देते हैं तो बढ़ा-चढ़ा कर नहीं कहते और ढोल नहीं बजाते हैं । वह गुप्त होता है अंतस्तल का भाव होता है । राष्ट्र को तथा हिन्दुत्व को सुरक्षित रखने के निमित्त हमे अपने सामर्थ्य के अनुरूप समर्पण करना चाहिए । अब प्रश्न उठता है कि कैसा समर्पण तो कहते हैं कि तन मन धन का समर्पण । तन मन धन का समर्पण ही वास्तविक समर्पण माना जाता है –तन से मनसे धन से - हम करें राष्ट्र आराधन। सुरेश सोनी जी अपनी पुस्तक में बांसुरी के द्वारा कृष्ण के प्रति समर्पण का वर्णन किया है । गोपियों के मन मे बाँसुरी के प्रति कृष्ण के प्रेम के प्रति जब ईर्ष्या उत्पन्न होती है तो वह बांसुरी कहती है कि मैंने श्री कृष्ण के प्रति समर्पण के लिए अपना परिवार छोड़ दिया , तन- मन कटवाया, ग्रंथिंयों को भी छिदवाया -
प्रथम तज्यो सुन्दर बाँस झाड़ी रे।
तन कटवायो, मन कटवायो,
ग्रंथिन ग्रंथिन में छिडवायो,
जैसो बजायो श्याम तैसो सुर सुनायो,
एहि कारण मोहे अधर पर धरत मुरारि रे।।
★ गुरु गोविंद सिंह ने राष्ट्र के स्वाभिमान के रक्षार्थ अपने चार-चार बच्चों को राष्ट्र की बलिवेदी पर चढ़ा दिया , राणा प्रताप राष्ट्र के स्वाभिमान के रक्षार्थ लगातार मुगल सेना से लोहा लेते रहे , जंगल जंगल भटके और सूखी रोटियां खाई पर उन्होंने हार नहीं मानी, शिवाजी को आजीवन लड़ने की क्या जरूरत थी, राजा थे ही , घर मे सुख-चैन से रह सकते थे । लेकिन राष्ट्र के रक्षार्थ शिवाजी ने अपने आप को न्योछावर कर दिया । हम सभी को इन आत्म बलिदानियों के जीवन से शिक्षा लेकर राक्षसी प्रवृत्ति वाले गिद्धों से राष्ट्र को बचाने के लिए हर प्रकार का त्याग और समर्पण करना चाहिए ।।
भारत माता की जय।
द्वारा:-
डॉ0 नरेन्द्र कुमार राय
