विजयादशमी Vijayaadashami

विजयादशमी

उत्” उपसर्ग के साथ “सव” शब्द के मिलने से “उत्सव” शब्द का निर्माण होता है। `सव` शब्द का अर्थ होता है – सूर्यचंद्रयज्ञ और तर्पण। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि उत्सव मनाने से समाज में सूर्य का तेज, चंद्रमा की शीतलता तथा त्याग और समर्पण का भाव उत्पन्न होता है। उत्सव एक ऐसा माध्यम है जो समाज के हर प्रकार के लोगों को मिलने और मिलाने का काम करता है। कुल मिलाकर यह आनंद के भाव को बढ़ाने वाला मध्यम होता है।

           जब हम कोई उत्सव मनाते हैं तो इससे सुप्त केंद्रों में स्फूर्ति का पुनर्जागरण होता , अखिल भारतीय राष्ट्रीय दृष्टि का निर्माण होता है तथा समाज के लोगों को अपने साथ जोड़ने का एक अवसर प्राप्त होता है।

          विजयादशमी भारतीय संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण उत्सव है । यह शदियों से भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है । यह पर्व आश्विन शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। यह शक्ति की उपासना का सबसे पवित्र दिन है। इस उत्सव को मनाने का उद्देश्य जन-जन में विजिगीषु वृत्ति , पुरुषार्थ, राष्ट्रभाव एवं आत्मगौरव के भाव को जगाना तथा पराभूत मानसिकता में परिवर्तन करना है ।

       राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ छः उत्सवों को मनाता है – प्रतिपदा उत्सव, हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव, गुरु पूर्णिमा उत्सव, रक्षाबंधन उत्सव, विजयादशमी और मकर संक्रांति। इसमें हिंदू साम्राज्य दिवस को छोड़कर ऐसा कोई भी उत्सव नहीं है जिसे हिंदू समाज सदियों से मनाते हुए नहीं आ रहा है। अर्थात्  संघ उन्हीं उत्सवों को मनाता है जिसे हिंदू समाज मनाता रहा है ।

        भारतीय संस्कृति में अहिंसा का उच्चतम स्थान है परंतु इसका भाव यह नहीं किइस जीवन  पद्धति में जीने वाले गर्व रहित, दब्बू और  कमजोर हैं।  अहिंसा सद्गुण है पर इसे कुछ लोगों ने सद्गुण-विकृति का रूप मान लिया है । सहनशील होने का यह तात्पर्य नहीं कि आसुरी शक्तियों का प्रतिकार करने में हम कहीं कम हैं। सहनशीलता ही हमारी शक्ति है । सहनशीलता को तभी महत्त्व प्राप्त होता है शक्ति का सम्बल साथ में होता है ―

सहनशीलता क्षमा दया को तभी पूजता जग है|   बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है ||

 सनातन संस्कृति के विचार के अनुसार भारत के लोग पूरे विश्व को ही अपना कुटुंब मानते हैं। वसुधैव कुटुंबकम का भाव भारतीय संस्कृति में ही पाया जाता है –

     अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम् ।      उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।।

ऐसा विचार किसी अन्य धर्म में देखने को नहीं मिलता । भारत के लोगों ने सबको अपना परिवार माना है । इसलिए कभी भी भारत ने किसी अन्य देश पर विजय प्राप्त करने की लिप्सा से आक्रमण नहीं किया। लेकिन भारत के लोगों के मन में विजिगीषा-भाव हमेशा ही उद्दीप्त रहा है। विजयादशमी का उत्सव ऐसे ही उद्दीप्त भावों को प्रदर्शित और स्फुरित करने वाला उत्सव है। संघ की प्रार्थना में स्वयंसेवक ईश्वर से अजेय शक्ति मांगते हैं परन्तु उस शक्ति में सुशीलता का भाव रहे , निरंकुश और घमंड युक्त शक्ति नहीं हो, ऐसी प्रार्थना भी करते हैं । स्वयंसेवक ईश्वर से प्रार्थना करते हैं- हे प्रभो ! शक्ति के साथ सुशीलता भी देना जिससे कि पूरा संसार नम्र हो।

      देवी दुर्गा सभी शक्तियों का एक संगठित रूप है । राम का तीर-धनुष, कृष्ण का चक्र, शिव का त्रिशूल, विष्णु का कमल आदि अनेक शक्तियों का संगठित रूप धारण करके दुर्गा ने आतताई राक्षसराज महिषासुर का बध किया था। रामचंद्र भारतीय संस्कृति के पुरुषोत्तम राम कहे जाते हैं I जिस देश में “ मातृवत्परदारेषु “ का भाव व्याप्त है उस देश में परस्त्री के साथ दुर्व्यवहार करने वाले आततायी रावण को समाप्त करने के उद्देश्य से लंका में प्रवेश के लिए उन्होंने समुद्र से राह मांगी । इसके लिये उन्होंने तीन दिन तक समुद्र की पूजा-अर्चना की । परंतु समुद्र ने उनकी विनती का महत्त्व नहीं दिया। अन्त में राम को शस्त्र सन्धान करना पड़ा । रामचरितमानस में तुलसी दास कहते हैं –

  “ विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।       बोले राम सकोप तबभय बिनु होइ न प्रीति।।

   “ लछुमन बान सरासन आनू  सोखउँ वारिधि विशिख कृशानु।।

हे लक्ष्मण ! मेरा अग्नि बाण लाओ | मैं समुद्र के पानी को ही सुखा देता हूँ | जब समुद्र शांति की भाषा नहीं समझा तो अपनी शक्ति का अहसास कराने के लिए श्रीराम ने अपना रौद्र रूप प्रदर्शित किया | फिर समुद्र थाल में पूजा की सामग्री लेकर श्रीराम के चरणों में हाजिर हो गया | दिनकर कुरुक्षेत्र में लिखते हैं –

 तीन दिवस तक पंथ मांगते , रघुपति सिन्धु किनारे |    बैठे  पढ़ते  रहे छन्द ,   अनुनय के प्यारे प्यारे ||       सिन्धु देह धर त्राहि त्राहि, करता आ गिरा शरण में |   चरण पूज दासता  ग्रहण की, बंधा मूढ बंधन में ||

           इस प्रकार शत्रु शक्ति की भाषा को ही पहचानते हैं | उनके सामने शिष्टाचार, प्रेम और भ्रातृत्व की भाषा काम नहीं आती है –

सच पूछो तो शर में ही बसती है दीप्ति विनय की |सन्धि वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की ||

           रामचन्द्र ने शमी वृक्ष की पूजा की और फिर आततायी रावण का  विजयादशमी के दिन वध किया | इसलिए हम विजयादशमी उत्सव को अन्याय पर न्याय की , असत्य पर सत्य की , बुराई पर अच्छाई की तथा अनाचार पर सदाचार की जीत के रूप में मनाते है |

         विजयादशमी को हमलोग शस्त्रपूजन भी करते हैं | प्राचीन काल से अपनी संस्कृति में प्रतिघात का प्रतीक शस्त्रपूजन की परम्परा रही है |  महाभारत काल में भी पाण्डवों ने शस्त्र-पूजन का कार्य किया था | पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का गुप्तवास मिला था | गुप्तवास के प्रारंभ होने पर उन्होंने अपने शस्त्रों को शमी के वृक्ष पर छिपा दिया | जब गुप्त वास समाप्त हुआ तो शमी के वृक्ष पर से शस्त्रों को उतारकर पांडवों ने उनकी पूजा की | वह विजयादशमी का ही दिन था  और फिर वे अन्याय के खिलाफ़ युद्ध में उत्तर पड़े | हिन्दू केवल शास्त्र ही नहीं पूजता , आवश्यकता पड़ती है तो शस्त्र का सम्बल लेने में संकोच नहीं करता । इसलिए भारतीय समाज के लोग विजयादशमी के समय में शमी-वृक्ष की भी पूजा करते हैं |

             कुछ सौ वर्षों पहले हिन्दवी साम्राज्य की नींव रखने वाले छत्रपति शिवाजी ने भी विजयादशमी के दिन सिमोल्लंघन का अभियान शुरू किया | उन्होंने महसूस किया कि अपने अगल-बगल के छोटे-छोटे राज्यों पर आसुरी विचारधारा प्रभावी है | विस्तृत महान मानव-धर्म को सद्धर्म मानने वाले देश में संकीर्ण आसुरी विचार पाँव फैलाते जा रहे हैं | हिंदुओं के मन में हिंदुत्व का भाव तिरोहित होते जा रहा है | इसलिए अपने सनातान और हिंदुत्व के भाव को पुनः जगाने के लिए हिन्दवी  साम्राज्य का आरोपण करना ही होगा | यह विचार करके शिवाजी ने विजयादशमी के दिन अपनी सीमाओं से बाहर निकल करके विरोधी राजाओं की राजसत्ता पर  हिंदुत्व की विजय पताका फहराने का अभियान शुरू किया |

            राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना डॉ0 केशव बलिराम हेडगेवार ने विजयादशमी (27 सितंबर) 1925 को की थी | उस दिन मोहिते बाड़े में संघ के संस्थापक डॉ साहेब ने अपने धर्म और गौरवशाली परम्परा के प्रति तन्द्रा में अलसाये और हम सब हिन्दू एक परिवार के हैं, इस भावना को भूलकर विभिन्न विचारों में बिखरे हिन्दू समाज को संगठित करने का संकल्प लिया | उन्होंने यह महसूस किया कि आसुरी मानसिकता  वाले लोग समाज की प्रतिष्ठा को बर्बाद  करने का प्रयास कर रहे हैं और हिंदुत्व पर लगातार कुठाराघात कर रहे हैं | लालच, स्वार्थ और ढुलमुल विचारों के कारण कुछ हिन्दुओं के मन में हिंदुत्व का भाव तिरोहित होता जा रहा है | भरत की इस पावन भूमि पर संकीर्ण मत-पंथ पाँव पसारते चले जा रहे हैं | डॉक्टर साहब ने यह अनुभव किया कि जब तक हिन्दुओं के मन में आत्म-गौरव और आत्म-सम्मान का पुनर्बोध जो सुसुप्तावस्था में है,  जाग्रत नहीं होगा तबतक इन सोये हुए शेरों को जगाना असंभव है। इसके लिए  डॉ0 साहब ने संगठन का निर्माण आवश्यक समझा | संगठन का निर्माण कर दुष्टों का नाश करना महात्मा लोगों की प्रकृति रही है | हमारे ऋषियों ने कहा है –

गोपालसांघिकः कृष्ण: रामो वानर सांघिकः|   सद्भिक्षु सांघिकः बुद्ध: महात्मानो हि संघिकः ||

               कृष्ण ने ग्वाल बालों का संगठन तैयार किया और आतताई कंस का वध किया | भले ही कंस अपना मामा था लेकिन भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है कि ”न्यायार्थ अपने बंधु को भी दंड देना धर्म है” यह विचार मानकर चलती है| पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र ने जंगल में रहने वाले हर प्रकार के वनवासियों का सहयोग लेकर, गिलहरी जैसे जीव का सहयोग लेकर, बंदर-भालुओं का सहयोग लेकर संगठन बनाया और आतताई रावण का वध किया | महात्मा बुद्ध ने सद्भिक्षुओं का संगठन बनाया तथा विश्व के कोने-कोने में अपने विचार को प्रसारित करने का प्रयत्न किया जिसमें उनको सफलता भी मिली । महात्माओं ने अनुभव किया कि संगठन में ही शक्ति है । इसलिए समय-समय पर संगठन बनाकर आततायी और विरोधी शक्तियों का संहार किया है |

                  संघ इस उत्सव को सामाजिक समरसता के रूप में भी मनाता है । जिस प्रकार से समाज के अन्यलोग  कलश स्थापना कर पूजा करते हैं, वे कन्या पूजन करते  हैं, उसी प्रकार से संघ से जुड़े लोग भी समाज के हर तबके के लोगो के घर की बेटियों को मान-सम्मान के साथ बुलाते है और उनको पूजते हैं । उसमें छोटा-बड़ा, ऊँच-नीच, धनी-गरीब का भाव नहीं रहता । बेटियों के साथ-साथ उनके माता-पिता को भी बुलाते हैं और समाज के सबलोग मिल-जुलकर एक पाँति में खाते हैं । इस प्रकार इस अवसर पर समाज के सभी प्रकार के लोगों के साथ मिलकर उत्सव मनाने का आनंद ही कुछ और होता है । हिन्दू समाज के सभी भाई-बन्धु एक परिवार का वातावरण तैयार करते है―  

         ” हिन्दव: सोदरा सर्वे  न हिन्दू पतितो भवेत् ।      मम दीक्षा हिन्दू – रक्षा मम मन्त्रः समानता  ।।”

        इस प्रकार सामाजिक समरसता का यह संदेश भी समाज में इस उत्सव के माध्यम से देते हैं ।    

 श्रद्धा, विश्वास और उत्साह से युक्त होकर तथा संगठित होकर यदि हम देश को मजबूत करें तो हंसते-खेलते सारे संकटों को पार कर सकेंगे – संघे शक्तिः कलौ युगे | यही विजयादशमी का संदेश है | संघ ने भारत को परम वैभव की ओर ले जाने के लिए अपना ध्येय बनाया है | उसको पूरा करने के लिए संघ ने जिस संगठन का निर्माण किया उसका प्रभाव आज पूरे विश्व में दिख रहा है| भारतीयों का यदि इसी प्रकार से जनजागरण होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत पुनः विश्व गुरु के स्थान को प्राप्त करेगा।

               “ भारतमाता की जय | “

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *