रानी अबक्का उल्लाल की रानी थी । उसने पुर्तगालियों को अनेकों बार हराया .
भारतीय इतिहास में दक्षिण भारत का विजयनगर साम्राज्य अपनी गौरव गाथाओं से ओत- प्रोत है। 16वीं सदी के द्वितीय और तृतीय दशक में हिंदू राजा कृष्णदेव राय के नेतृत्व में विजयनगर साम्राज्य अपने चरम उत्कर्ष पर था। तुलवा राजवंश के सम्राट् कृष्ण देव राय ने 1509 ईस्वी में विजयनगर साम्राज्य की बागडोर संभाली। कुशल नेतृत्व और अपने पराक्रम के बल पर केवल 20 वर्षों में ही श्री कृष्णदेव राय के राज्य की सीमाएं पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर, उत्तर में कृष्णा नदी तथा दक्षिण में हिंद महासागर तक फैल गयीं। 1529 में कृष्णदेव राय का बीमारी के कारण देहावसान हो गया । उनकी मृत्यु के बाद उनके छोटे भाई अच्युतदेव राय तथा उनके बाद कृष्णदेव राय के दामाद राम राय ने विजयनगर साम्राज्य की बागडोर संभाली । लेकिन राजनीति और कूटनीति की अपरिपक्वता के कारण विजयनगर साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर होने लगा।
दूसरी ओर भारत के दक्षिणी छोर पर प्रभुत्व जमाने के लिए पुर्तगालियों ने तूफान मचा रखा था। पुर्तगालियों ने देखते-देखते गोवा पर 1510 में अधिकार जमा लिया मसाले का व्यापार करने वाले व्यापारियों ने सीधे-साधे भारतीयों की एकता की कमी के कारण भारत के पश्चिमी छोर पर अपने शासन की धमक उपस्थित कर दी । उनकी एक ही महत्वाकांक्षा थी कि भारत के संपूर्ण पश्चिमी भाग अर्थात् महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक तथा केरल के तटीय भागों पर अधिकार जमा लिया जाए । भारत के भविष्य पर ग्रहण लगने लगा था। मात्र 400 वर्ष पहले भारतीय व्यापारी जो विश्व व्यापार में शीर्ष स्थान पर थे, जो बड़े-बड़े जहाजों में विश्व की यात्रा किया करते थे , उस व्यापार पर पुर्तगालियों की नजर लग गई।
उधर उत्तर भारत में मुगलों के हमले बढ़ रहे थे। 1526 में बाबर का प्रवेश हो चुका था तथा विजयनगर साम्राज्य के पड़ोस में बीजापुर की आदिलशाही ने भी विजयनगर के लिए एक चुनौती खड़ी कर दी थी।
इन सब घटनाओं के बीच विजयनगर साम्राज्य के द्वारा ही पोषित एक छोटा राज परिवार – चौटा राजवंश,जो धार्मिक विचारों से जैन था, राज करता था। तुलु नाडु कर्नाटक के मंगलौर, उडुपी तथा केरल के कासरगोड जिला का मिला-जुला क्षेत्र है । यहाँ के लोग तुलवा कहे जाते थे। कृष्णदेव राय भी इसी तुलवा वंश के ही थे। चौटा राजवंश की एक विशेषता थी कि उस वंश में प्रभुत्व मातृशक्ति का होता था। चौटा राजवंश की राजधानी मूडबिद्री थी जो उडुपी के पास थी। इसकी उप राजधानी उल्लाल थी।
चौटा राजवंश में 1525 ईस्वी में एक वीर बालिका का जन्म हुआ जिसका नाम अब्बक्का रखा गया। वह बचपन से ही साहसी और प्रत्युत्पन्नमति थी। अबक्का के मामा तिरुमला राय उस समय वहाँ के राजा थे। मामा तिरुमला राय जब भी तलवारबाजी और तीरंदाजी का अभ्यास करने निकलते, घुड़सवारी के लिए निकलते हैं तो अबक्का को भी साथ में ले लिया करते थे। मामा तिरुमला राय ने अबक्का को बचपन से ही घुड़सवारी, तलवारबाजी, तीरंदाजी का ऐसा प्रशिक्षण दिया की अबक्का बचपन में ही विभिन्न प्रकार के युद्ध- कौशल में पारंगत हो गई। जब अबक्का विवाह योग्य हुई तो मामा तिरुमला राय ने अबक्का का विवाह मंगलूर के एक प्रसिद्ध व्यापारी के युवक लक्ष्मप्पा से कर दिया। जब अबक्का अपनी ससुराल गई तो वहां भी वह अपने पति के साथ तलवारबाजी, तीरंदाजी तथा घुड़सवारी का अभ्यास करती रहती थी। इन सब कामों में पति लक्ष्मप्पा का सहयोग मिलता रहता था।
शादी के कुछ ही दिनों के बाद स्वाभिमानिनी अबक्का तथा लक्ष्मप्पा के बीच खटपट शुरू हो गई। लक्षमप्पा अबक्का की प्रतिभा और साहसिक भावना से भीतर-ही-भीतर जलने लगा। परिणाम स्वरुप अबक्का ससुराल से मामा तिरुमला राय के यहां आ गई। कुछ दिनों के बाद मामा तिरुमला राय ने लगभग 200 गाँवों की जागीर देकर अबक्का को उसकी रानी बना दिया । इसी क्षेत्र में उल्लाल भी पड़ता था जिसे महारानी अबक्का ने अपनी राजधानी बना दी। उल्लाल मंगलोर से कुछ दूरी पर समुद्र के किनारे होने के कारण व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत ही महत्वपूर्ण था। रानी अबक्का के कुशल नेतृत्व में राज्य का विकास तेज गति से होने लगा। उसने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि प्रजा को किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं हो। वह प्रजा की समस्या- समाधान के लिए प्रत्यक्ष संवाद शुरू किया । परिणाम स्वरुप प्रजा में रानी की प्रतिष्ठा लगातार बढ़ने लगी।
उल्लाल अरब सागर के तट पर रहने के कारण विदेशी व्यापारियों के लिए एक आकर्षण का केंद्र था। उल्लाल एक ऐतिहासिक स्थान और तीर्थ स्थल भी था क्योंकि रानी ने वहां शिव का एक सुंदर मंदिर बनवाया था । वहां एक नैसर्गिक शिला भी थी जिसे "रूद्र शिला" कहा जाता था । उस रूद्र शिला पर पानी की बौछार होते ही वह अपना रंग बदलती रहती थी।
पुर्तगाली वास्कोडिगामा 1497 में भारत आया तथा लगभग 1501 में कैब्राल नाम का एक पुर्तगाली जनरल 1200 सैनिकों के साथ भारत आया। कालीकट का राजा जमोरिन कहलाता था। जमोरिन हिंदुओं की एक जाति थी । जमोरिनो ने कैब्राल की खूब आव -भगत की और उसे व्यापार करने की छूट दे दी । लेकिन कालीकट के स्थानीय व्यापारियों को पुर्तगालियों पर विश्वास नहीं हो पा रहा था, इसलिए कुछ दिनों के बाद उसके गोदाम को स्थानीय लोगों ने लूट लिया । कैब्राल क्रोधित होकर कालीकट शहर पर तोपों से आक्रमण कर दिया जिसके चलते जमोरिनों के राजा को अपना किला छोड़कर बाहर भागना पड़ा । इस प्रकार बार-बार पुर्तगालियों के आने-जाने से पुर्तगालियों का प्रभाव कालीकट पर जम गया।
1505 में पुर्तगालियों के राजा इमानुएल ने अपना पहला गवर्नर “फ्रांसिस्को दी अलमेडा” को भारत भेजा। उसनेआदिलशाही की कमजोरी का फायदा उठाकर 1510 में गोवा पर नियंत्रण कर लिया। धीरे-धीरे पुर्तगालियों ने महाराष्ट्र के समुद्री इलाकों पर भी अपना प्रभाव जमा लिया। तत्पश्चात कनारा क्षेत्र (कर्नाटक ) तथा मालाबार तट ( केरल का तटीय क्षेत्र )पर भी उनका ध्यान गया। अब उनका पहला मुख्य लक्ष्य मंगलूर तथा धनवान शहर उल्लाल थे।
सन 1525 में पुर्तगालियों ने मंगलूर पर पहला हमला किया तथा मंगलूर को तहस-नस कर दिया । अधिकार हो जाने के बाद वहाँ पर पुर्तगालियों ने ईसाई धर्म का प्रचार प्रारंभ किया। रानी अबक्का अपने पड़ोस में घट रही इन घटनाओं पर ध्यान लगाए हुए थी।
तत्पश्चात 1546 में पुर्तगालियों ने उल्लाल पर आक्रमण किया। उस समय महारानी अबक्का 21 वर्ष की हो गई थी और उल्लाल की महारानी बन गई थी । महारानी अबक्का ने अपनी कूटनीति और युद्ध कौशल का प्रयोग कर पुर्तगालियो को मार भगाया।
1555 में पुर्तगालियों की सेना एडमिरल “डोम अल्वारो द सिल्वेरिया” के नेतृत्व में उल्लाल पर आक्रमण किया। रानी अबक्का ने उसे युद्ध में अग्निबाण का प्रयोग किया और “डोम अल्वारो सिल्वेरिया” को पकड़ लिया तथा उसे रस्सी में बंधवा कर पिटवाया और उसे खदेड़ दिया।
दो वर्ष बाद 1557 में पुर्तगालियों ने उल्लाल पर भयंकर हमला बोला। परंतु रानी के सैनिकों ने नारियल के पत्तों के द्वारा बनाए हुए अग्नि वाणों का घनघोर प्रयोग किया और पुर्तगालियों के अनेक जहाजों में आग लगा दी। इस प्रकार रानी की रणनीति कुशलता के कारण उन्हें पुनः परास्त होकर गोवा भागना पड़ा। 1558 तथा 1565 में उल्लाल पर पुनः हमला किया गया । अनेक निर्दोषों की हत्याएं की गई, मंदिरों को लूटा और तोड़ा गया । परंतु रानी की वीरता के कारण पुर्तगालियों का सपना सपना ही रहा। इस प्रकार 1546 से लेकर 1565 तक लगभग 19 वर्ष तक पुर्तगालियों ने बार-बार उल्लाल पर अधिकार जमाने के लिए प्रयास किया परंतु रानी की रणनीतिक कुशलता के कारण उन्हें बार-बार मुंह की खानी पड़ी।
रानी का छापामार युद्ध
1568 में पुर्तगाली वायसराय एंटोनियो नरोन्हस ने उल्लाल पर विजय प्राप्त करने के लिए जनरल जोआओ पिक्सिटो को भेजा। उसने उल्लाल पर चढ़ाई करने के पहले पड़ोस के राज्य मंगलूर पर आक्रमण किया और उसे अपने कब्जे में लेकर फिर उल्लाल की ओर बढ़ा उसके मन में था कि जब मंगलूर पर हमने विजय प्राप्त कर ली तो छोटे से राज्य उल्लाल पर विजय पाना कौन बड़ी बात है भारत की महिलाएं कोमल होती हैं वे युद्ध लड़ना क्या जाने। मैं उसको सबक सिखाऊंगा मैं बताऊंगा कि युद्ध कैसे होता है।
आधुनिक साजो –सामान से लैस पुर्तगाली तथा परंपरागत हथियारों वाले रानी के सैनिक। जब पुर्तगाली सेना उल्लाल किले की ओर बढ़ चली तो महारानी अबक्का ने उन्हें अपने किले में आ जाने दिया , कहीं पर कोई प्रतिरोध नहीं हुआ। रानी अपने देश भक्त सैनिकों के साथ किला से कुछ ही दूरी पर एक मंदिर में जाकर छिप गई। महारानी ने अपनी योजना बना ली थी – चढ़ जा बेटा सूली पर। उधर पुर्तगाली सेना बिना किसी प्रतिरोध के उल्लाल किले में प्रवेश कर गई। वहां कोई नहीं था पूरा किला खाली था। पुर्तगाली सैनिकों की खुशी का ठिकाना नहीं। रात हो चली थी । जनरल जोआओ पिक्सिटो अपने सैनिकों को बुलाकर के विजय के नशे में उन्माद भरे शब्दों में बोला – “अरे ओ मेरे सैनिकों! मैदान खाली है, बुजदिल शत्रु भाग गया है। तुम सब लोग सुरा और सुंदरियों का आनंद उठाओ , मौज करो, नाचो, गाओ, पियो, खाओ और आनंद मनाओ।” इस प्रकार पुर्तगाली सुंदरियों का नृत्य प्रारंभ हुआ। पुर्तगाली सैनिक शराब की बोतल के समान नशे में इधर-उधर ढिलमिलाने लगे। शराब का शबाब चरम पर था। किसी को कोई होश नहीं।
तभी अचानक ही “हर हर महादेव के नारों से आकाश गूंज उठा रात के अंधेरे में रानी के 200 चुनिंदे सैनिकों ने किले पर अचानक की धावा बोल दिया। रानी के सैनिक चितों की फूर्ति से पुर्तगाली सैनिकों के सर धड़ से अलग करने लगे । देखते ही देखते किला का प्रांगण पुर्तगालियों के खून से रंग गया । उसके 70 सैनिकों को बंदी बना लिया गया। जनरल जोआओ पिकसीटो को पकड़ लिया गया। उसे बंदी बनाकर महारानी अबक्का के पास लाया गया। जोआओ रानी के सामने हाथ जोड़े हुए गिड़गिड़ा रहा था । तभी रानी के एक सैनिक ने कहा – अब तेरा क्या होगा रे गोरा !
महारानी! मुझे क्षमादान दे दो- जोआओ ने कहा।
“नहीं ! अब तुम अपनी जान दो” – सिंहनी की तरह गलती हुई आवाज में महारानी ने कहा। बादलों के बीच में जैसे बिजली चमकती है इस तेजी के साथ रानी ने म्यान से तलवार निकाली और एक “छप” की आवाज के साथ दुश्मन का सर धड़ से अलग कर दिया। दुश्मन का कटा सर फर्श पर धड़ाम से गिर गिर गया । “महारानी की जय, महारानी की जय” सैनिकों के इस प्रकार के गगनभेदी नारों से दिग्दिगंत हिल उठा। किले में चारों ओर विजय दुंदुभी बजने लगी। युद्ध के अंत में रानी ने अपने सैनिकों को एक छोटा भाषण देते हुए कहा –”मेरे वीर सैनिकों! यह विजय तुम्हें समर्पित है। राष्ट्र की अस्मिता पर कुठाराघात करने वाले शत्रुओं को कभी भी क्षमादान नहीं देना चाहिए, उसका संहार करना चाहिए ताकि दूसरे शत्रुओं को सबक मिले।”
रानी की इस युद्ध शैली का प्रयोग लगभग 100 वर्ष बाद महाराज शिवाजी ने भी किया था।
1569 में पुर्तगालियों ने पुनः आक्रमण किया और मंगलूर कथा कुंडपुर पर अधिकार जमा लिया । 1570 में रानी ने कालीकट के जमीरन राजा से संधि कर मंगलूर पर आक्रमण किया । जमीरन सेना के सरदार कुट्टीपोकर मार्कर तथा रानी की सेना ने वीरता पूर्वक पुर्तगालियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी तथा पुर्तगाली सेना के प्रमुख एडमिरल मस्कारेनहास को मार डाला गया । रानी की सेवा विजय की ओर बढ़ रही थी तभी पुर्तगालियों ने एक चाल चली । रानी का पति लक्ष्मप्पा इसी मंगलूर में रहता था। वह भीतर- ही- भीतर रानी से खार खाए रहता था। पुर्तगालियों ने उसका प्रयोग किया और धोखे से रानी को बात करने के लिए बुलाया गया। रानी वार्तालाप के लिए तैयार हो गई। जब वह वार्ता करने के लिए प्रस्तावित स्थान पर गई तो उसे धोखे से बंदी बना लिया गया तथा जमीरन के सरदार कुट्टी पोकर मारकर की हत्या कर दी गई। 1570 में रानी जेल में रहते हुए भी पुर्तगालियों से लड़ती रही और एक दिन पुर्तगाली सैनिकों के साथ लड़ते-लड़ते देश के लिए बलिदान हो गई।
ऐसी वीरांगना को शत-शत नमन।

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